सुन्दर काण्ड (चौपाई 7)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 7 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।

2. शाब्दिक अर्थ

शाब्दिक अनुवाद:

जिस पर्वत पर हनुमान जी ने अपना चरण रख दिया, वह तुरंत ही पाताल (पृथ्वी के नीचे का लोक) में चला गया।

3. भावार्थ

इस चौपाई में हनुमान जी की अद्भुत शक्ति और उनकी विशालता का वर्णन है। जब हनुमान जी को सीता माता की खोज करते हुए लंका जाना था, तब उन्होंने जिस पर्वत पर अपना पैर रखा। इससे उस पर्वत में इतना वजन पड़ा कि वह तुरंत ही पाताल लोक में धंस गया। इससे हनुमान जी की शक्ति, गुरुत्वाकर्षण और भारीपन का बोध होता है।

4. दार्शनिक एवं सांस्कृतिक विवेचन

अ. हनुमान की शक्ति का प्रतीक

इस चौपाई में हनुमान जी की शारीरिक और आध्यात्मिक शक्ति का वर्णन है। यह बताता है कि भक्ति और विश्वास से कोई भी इंसान या देवता असाधारण कार्य कर सकता है।

हनुमान जी का चरण जिस पर पड़ा, वह पर्वत भी अपनी स्थिति नहीं रख सका। यह भक्ति के समक्ष सांसारिक बंधनों के टूटने का प्रतीक है।

आ. आत्मविश्वास और निर्भयता

हनुमान जी का यह कार्य दिखाता है कि जब कोई पूरी श्रद्धा और ईमानदारी से किसी कार्य में जुट जाता है, तो प्रकृति भी उसके लिए मार्ग प्रशस्त कर देती है।

यह आत्मविश्वास और निर्भयता की भी शिक्षा देता है।

इ. भक्ति की शक्ति

हनुमान जी ने अपने भक्ति भाव से श्रीराम के कार्य को सर्वोपरि माना। इसी भक्ति के बल पर उन्हें असीम शक्ति प्राप्त हुई।

यह भक्ति की शक्ति का प्रतीक है, जो सभी बाधाओं को दूर कर देती है।

5. सांस्कृतिक महत्व

इस चौपाई से हनुमान जी की महिमा और उनकी भक्ति का महत्व स्पष्ट होता है।

यह हिन्दू संस्कृति में भक्ति, शक्ति और निष्ठा के प्रतीक के रूप में प्रचलित है।

सुंदरकांड में यह प्रसंग हनुमान जी की लंका यात्रा के दौरान आता है, जो भक्तों को प्रेरणा देता है।

6. निष्कर्ष

"जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।"

यह चौपाई हनुमान जी की अद्भुत शक्ति, भक्ति और निर्भयता का प्रतीक है।

यह सिखाता है कि भक्ति और विश्वास के बल पर कोई भी कार्य संभव है और भक्ति के समक्ष सभी बाधाएँ दूर हो जाती हैं।

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