सुन्दर काण्ड (चौपाई 4)
सुन्दर काण्ड चौपाई 4 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
चौपाई
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।।
भावार्थ
अर्थ:
हनुमानजी ने अपने कार्य सिद्धि का विचार करके सबको (वहाँ उपस्थित वानरों को) प्रणाम किया, और अपने हृदय में प्रभु श्रीराम का ध्यान करते हुए प्रसन्नता से लंका की ओर प्रस्थान किया।
विस्तृत विवेचन
1. सन्दर्भ
यह चौपाई उस समय की है, जब हनुमानजी लंका में सीता माता की खोज के लिए जा रहे हैं। इस दौरान वे अपने साथियों को प्रणाम करते हैं और अपने हृदय में श्रीराम का ध्यान करते हुए वहां से प्रस्थान करते हैं।
2. भाव और भक्ति
हनुमानजी का यह कृत्य उनकी विनम्रता, सहयोगियों के प्रति आदर और प्रभु राम के प्रति अटूट भक्ति का प्रतीक है।
विनम्रता: सभी को प्रणाम करना, यह दर्शाता है कि हनुमानजी अपने कार्य की सफलता के लिए विनम्रतापूर्वक सभी को सिर झुका कर प्रणाम करते हैं।
भक्ति: “हियँ धरि रघुनाथा” – हृदय में रघुनाथ (श्रीराम) का ध्यान करना, यह दर्शाता है कि हनुमानजी का हर कार्य प्रभु श्रीराम के प्रति समर्पित है।
3. प्रसन्नता और सफलता
“चलेउ हरषि” – हनुमानजी प्रसन्नतापूर्वक हृदय में रघुनाथ (श्रीराम) को रखकर वहां से लंका की ओर प्रस्थान करते हैं।
4. सामूहिकता और सहयोग
हनुमानजी सभी को प्रणाम करते हैं, यह दर्शाता है कि उनके लिए सबका सहयोग महत्वपूर्ण है। वे अकेले नहीं, बल्कि सभी के साथ मिलकर कार्य करते हैं।
सारांश
यह चौपाई हनुमानजी की विनम्रता, भक्ति, प्रसन्नता और सहयोग की भावना को दर्शाती है। हनुमानजी अपने कार्य को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए हृदय में श्रीराम को विराजमान करके सभी को श्रद्धापूर्वक सिर झुकाकर लंका की ओर प्रस्थान करते हैं। यह रामायण के सुन्दरकाण्ड का एक प्रेरक और भावपूर्ण प्रसंग है।
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