सुन्दर काण्ड (श्लोक 3)

 सुन्दर काण्ड श्लोक 3 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

श्लोक

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं

दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।

सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं

रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।


शब्दार्थ

अतुलितबलधामं – अतुलनीय बल का भंडार

हेमशैलाभदेहं – सोने के पर्वत के समान कांतिमय शरीर वाले

दनुजवनकृशानुं – राक्षसों के वन को जलाने वाले (राक्षसों के वंश को नष्ट करने वाले)

ज्ञानिनामग्रगण्यम् – ज्ञानियों में अग्रणी

सकलगुणनिधानं – सभी गुणों का खजाना

वानराणामधीशं – वानरों के स्वामी

रघुपतिप्रियभक्तं – श्रीराम के प्रिय भक्त

वातजातं – पवनपुत्र (हनुमान)

नमामि – मैं नमन करता हूँ

भावार्थ

इस श्लोक में हनुमान जी की विशेषताओं का वर्णन करते हुए उन्हें नमन किया गया है:

अतुलितबलधामं – हनुमान जी अपार बल के भंडार हैं। उनका बल अतुलनीय है, जिसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता।

हेमशैलाभदेहं – उनका शरीर सोने के पर्वत की तरह कांतिमय और देदीप्यमान है, जो उनकी दिव्यता और तेजस्विता को दर्शाता है।

दनुजवनकृशानुं – वे राक्षसों के वन (समूह) को जलाने वाले हैं। यहाँ राक्षसों से तात्पर्य अधर्म, अज्ञान और बुराई से है, जिन्हें हनुमान जी अपने बल और बुद्धि से नष्ट कर देते हैं।

ज्ञानिनामग्रगण्यम् – वे ज्ञानियों में सर्वश्रेष्ठ हैं। उनकी बुद्धि और ज्ञान अद्वितीय है।

सकलगुणनिधानं – वे सभी गुणों का भंडार हैं। सच्चाई, निष्ठा, वीरता, बुद्धिमत्ता, भक्ति आदि सभी गुण उनमें विद्यमान हैं।

वानराणामधीशं – वे वानरों के स्वामी हैं। हनुमान जी वानर सेना के नायक हैं।

रघुपतिप्रियभक्तं – वे श्रीराम के प्रिय भक्त हैं। उनकी भक्ति निस्वार्थ और अनन्य है।

वातजातं – वे पवनदेव के पुत्र हैं, अर्थात् पवनपुत्र हनुमान।

नमामि – मैं उन्हें नमन करता हूँ।

विस्तृत विवेचन

इस श्लोक के माध्यम से हनुमान जी के गुणों, शक्तियों और उनकी भक्ति का वर्णन किया गया है। यह श्लोक हनुमान जी के प्रति श्रद्धा और भक्ति को प्रकट करता है। हनुमान जी को न केवल बलवान, बल्कि ज्ञानी, गुणवान और भक्तों में श्रेष्ठ माना गया है। उनकी भक्ति श्रीराम के प्रति इतनी गहरी है कि वे राम के प्रिय बन जाते हैं।

हनुमान जी का शरीर सोने के पर्वत की तरह चमकता है, जो उनकी दिव्यता का प्रतीक है। वे राक्षसों के वन को जलाने वाले हैं, अर्थात् वे अधर्म और बुराई का विनाश करते हैं। वे ज्ञानियों में अग्रणी हैं और सभी गुणों का भंडार हैं।

इस प्रकार, यह श्लोक हनुमान जी के व्यक्तित्व और उनकी महिमा को सुंदर ढंग से प्रस्तुत करता है।

संक्षिप्त संदेश

इस श्लोक का मूल संदेश है कि हनुमान जी में सभी दिव्य गुण विद्यमान हैं। वे बल, ज्ञान, भक्ति और निष्ठा के प्रतीक हैं। उनकी भक्ति श्रीराम के प्रति अनन्य है और वे अधर्म का विनाश करते हैं। इसलिए, हमें उनकी शरण में जाना चाहिए और उन्हें नमन करना चाहिए।

Comments

Popular posts from this blog

सुन्दर काण्ड (चौपाई 15-16)

सुन्दर काण्ड चौपाई ( 33-40)

सुन्दर काण्ड चौपाई (195-204)