सुन्दर काण्ड (दोहा 1)

 सुन्दर काण्ड दोहा 1 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।

शब्दार्थ

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम:

हनुमान ने  मैनाक पर्वत को  छु कर प्रणाम किया।

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम:

रामजी का कार्य किए बिना मुझे कहाँ विश्राम (शांति) मिल सकती है?

भावार्थ

इस दोहा में हनुमान जी की भक्ति, निष्ठा और कर्तव्यपरायणता की गहरी अभिव्यक्ति है।

 हनुमान जी जब सीता माता की खोज में समुद्र पार कर रहे थे,तब समुद्र देव ने मैनाक पर्वत को हनुमान जी को विश्राम देने के लिए कहा। तब हनुमान जी ने मैनाक पर्वत का स्पर्श करके प्रणाम किया और कहा कि बिना राम कार्य किए मुझे विश्राम नहीं है।

राम का कार्य और कर्तव्य:

हनुमान जी कहते हैं कि रामजी का कार्य किए बिना उन्हें विश्राम (शांति) नहीं मिल सकती। इसका अर्थ है कि हनुमान के लिए राम की सेवा सर्वोपरि है। वे स्वयं को राम की इच्छा का पूर्ण समर्पित सेवक मानते हैं और उनके कार्य को पूरा करने में ही अपनी शांति और आनंद देखते हैं।

विस्तृत विवेचन

भक्ति और समर्पण:

हनुमान जी का यह दोहा भक्ति और समर्पण की पराकाष्ठा को दर्शाता है। वे अपने आराध्य राम के कार्य को ही अपना सर्वस्व मानते हैं। उनके लिए राम की सेवा करना ही उनका ध्येय है और उसी में उन्हें आनंद और शांति प्राप्त होती है।

कर्तव्यनिष्ठा:

हनुमान जी की कर्तव्यनिष्ठा अद्वितीय है। वे अपने कार्य को पूरा करने के लिए ही जीवित हैं। उनके लिए राम का कार्य पूरा करना ही उनका मुख्य उद्देश्य है और उसी में वे अपना जीवन सार्थक मानते हैं।

आत्मनिरीक्षण और आत्मसंतुष्टि:

इस दोहे में हनुमान जी अपनी मनोदशा को व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि राम का कार्य किए बिना उन्हें कोई शांति नहीं मिल सकती। यह आत्मनिरीक्षण और आत्मसंतुष्टि का भी प्रतीक है कि सच्ची शांति और आत्मिक सुख तभी मिलता है जब हम अपने उद्देश्य और कर्तव्य को पूरा करते हैं।

सारांश

हनुमान जी के इस दोहे में भक्ति, कर्तव्यनिष्ठा और समर्पण की गहरी अभिव्यक्ति है। वे स्वयं को राम के कार्य के लिए समर्पित मानते हैं और उसी में अपना जीवन सार्थक समझते हैं। यह दोहा हर भक्त और सेवक के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

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