सुन्दर काण्ड (चौपाई 10)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 10 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

जात पवनसुत देवन्ह देखा।

जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।

यह चौपाई गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के सुंदरकांड में आती है। इसमें हनुमान जी के समुद्र लाँघने और लंका में प्रवेश करने के प्रसंग का उल्लेख है।

शब्दार्थ

जात — जा रहे हैं (हनुमान जी)

पवनसुत — पवन (वायु) के पुत्र, अर्थात् हनुमान जी

देवन्ह — देवताओं ने

देखा — देखा

जानैं कहुँ — जानने के लिए

बल — शक्ति

बुद्धि — विवेक, चतुराई

बिसेषा — विशेष, अद्भुत

भावार्थ

हनुमान जी जब लंका की ओर प्रस्थान कर रहे थे, तब देवताओं ने उन्हें देखा। देवता हनुमान जी की शक्ति और बुद्धि की विशेषता को जानने के लिए उत्सुक हो गए। वे यह देखना चाहते थे कि हनुमान जी में कितनी अद्भुत शक्ति और बुद्धि है, और वे इस कठिन कार्य को कैसे संपन्न करते हैं।

विस्तृत विवेचन

हनुमान जी जब समुद्र लाँघकर लंका जा रहे थे, उस समय समस्त देवता उन्हें देख रहे थे। देवताओं को ज्ञात था कि हनुमान जी में अद्भुत शक्ति और बुद्धि है, परंतु वे स्वयं भी उनकी परीक्षा लेना चाहते थे। इसलिए देवताओं ने सुरसा नामक नागमाता को भेजा, जिससे हनुमान जी की बुद्धि और शक्ति की परीक्षा ली जा सके।

इस चौपाई में यह भाव है कि जब कोई महान कार्य करने निकलता है, तो उसकी क्षमता और योग्यता की परीक्षा अवश्य होती है। हनुमान जी ने अपनी विवेकशीलता और सामर्थ्य से सभी परीक्षाएँ पार कीं। देवताओं ने भी हनुमान जी की शक्ति और बुद्धि को देखकर उनकी प्रशंसा की।

आध्यात्मिक संदेश

परीक्षा की घड़ी: जब भी हम कोई बड़ा कार्य करने निकलते हैं, तो प्रकृति, समाज या परिस्थितियाँ हमारी परीक्षा अवश्य लेती हैं।

शक्ति और बुद्धि का संतुलन: केवल बल से नहीं, बल्कि बुद्धि के प्रयोग से भी कठिन कार्यों को सरलता से किया जा सकता है।

विश्वास और समर्पण: हनुमान जी ने श्रीराम के प्रति अपनी भक्ति और समर्पण के बल पर असंभव कार्य को भी संभव कर दिखाया।

निष्कर्ष

इस चौपाई के माध्यम से तुलसीदास जी यह संदेश देते हैं कि जब कोई व्यक्ति सच्ची निष्ठा, श्रद्धा, बल और बुद्धि के साथ किसी कार्य को करता है, तो देवता भी उसकी सहायता करते हैं और उसकी परीक्षा लेकर उसे और अधिक सक्षम बनाते हैं। हनुमान जी की तरह हमें भी अपने जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना धैर्य, विवेक और शक्ति से करना चाहिए।

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